मेरा नाम सृष्टि है। अब मैं २२ की हो चुकी हूँ, लेकिन लगता है जैसे जिंदगी १९ पर ही थम गई हो। शादी हुई थी १८ की उम्र में, घरवालों ने जल्दी कर दी क्योंकि लड़का अच्छा था – सरकारी नौकरी, परिवार वाला, सब कहते थे परफेक्ट मैच। चार साल साथ रहे हम, खुश थे। वो मुझे बहुत प्यार करता था, छोटी-छोटी बातों पर लाड़ लड़ाता, रातें हमारी गरम रहतीं। लेकिन पिछले साल एक एक्सीडेंट… ट्रक से टक्कर, हॉस्पिटल में दो दिन लड़ा, फिर चला गया। मैं विधवा हो गई। २२ की विधवा। लोग सहानुभूति देते, घरवाले कहते सब ठीक हो जाएगा, लेकिन अंदर से सब टूट गया। मांग खाली, सिंदूर नहीं, मंगलसूत्र उतार दिया। सफेद कपड़े, जैसे जिंदगी का रंग ही चला गया। सास-ससुर हैं घर में, लेकिन उनकी नजरें अलग – जैसे मैं बोझ हूँ अब। बेटी नहीं हुई, वो भी एक कसूर। रातें अकेली कटतीं, बदन जलता रहता, पति की याद आती तो रोती, फिर खुद को छूती। लेकिन वो सुकून नहीं मिलता जो पहले मिलता था। मन में हजार सवाल – क्या मेरी जवानी यूं ही खत्म हो जाएगी? क्या कोई छूएगा भी मुझे कभी?
घर में मेरा देवर है, राहुल। उम्र २० की, कॉलेज फाइनल ईयर, घर पर ही रहता है। शादी के टाइम वो छोटा था, मुझे भाभी कहकर पीछे पड़ता था। लेकिन अब बड़ा हो गया – लंबा, गोरा, जिम जाता है रोज, बॉडी मजबूत, बाजू मोटे। वो मुझे बहुत देखभाल करता – खाना लेकर आता कमरे में, बातें करता, कभी बाहर घुमाने ले जाता बहाने से। सास-ससुर को लगता अच्छा है, देवर-भाभी का प्यार। लेकिन पिछले छह-सात महीनों से राहुल की नजरें बदल गईं। जब मैं नहाकर आती, बाल गीले, साड़ी चिपकी हुई बदन से, तो देखता रहता। या रसोई में झुककर काम करती तो पीछे खड़ा हो जाता, नजर गांड पर। मैं फील करती, शर्मा जाती, लेकिन मन में एक सिहरन होती। पति के जाने के बाद पहली बार कोई मुझे ऐसे देख रहा था। राहुल की आँखों में वो भूख, वो चाहत जो मेरे पति की थी कभी। मैं खुद को कोसती – गलत है, देवर है, छोटा है। लेकिन रात को अकेले लेटकर उसके बारे में सोचती। उसकी बॉडी, उसकी मुस्कान। उँगली करती तो उसका नाम लेती मन में। गिल्ट होता, रोती, लेकिन रुक नहीं पाती।
वो रात थी पिछले महीने की। सास-ससुर गांव गए थे किसी दूर के रिश्तेदार की तबीयत खराब होने पर, चार-पांच दिन के लिए। घर पर सिर्फ मैं और राहुल। दिन भर नॉर्मल था – मैं घर का काम करती, वो कॉलेज से आता, साथ खाना खाते, बातें करते। राहुल ज्यादा बात करने लगा था, मेरी तारीफ करता, “भाभी… आप कितनी सुंदर हो, भैया को याद करके दुखी मत हो।” मैं मुस्कुराती, लेकिन अंदर कुछ होता। शाम को बारिश शुरू हो गई, तेज, बिजली कड़क रही थी। लाइट गुल हो गई पूरी कॉलोनी में। मैं अपने कमरे में थी, सफेद साड़ी में, लेटी हुई छत देख रही थी। मन उदास, पति की याद आ रही थी। अचानक दरवाजा खटका। राहुल आया, मोबाइल की टॉर्च जलाकर। बोला, “भाभी… अंधेरा है, डर लग रहा है क्या? मैं यहीं बैठ जाऊँ?” मैं चौंकी, उठकर बैठ गई। बोली, “राहुल… नहीं बेटा… तू अपने कमरे में सो जा।” लेकिन आवाज में वो सख्ती नहीं थी। मन कहीं चाह रहा था कोई पास हो।
वो पास बैठ गया बेड पर। टॉर्च साइड में रखी, हल्की रोशनी। बोला, “भाभी… आप अकेली बहुत रहती हो। भैया होते तो अच्छा होता ना?” उसकी आवाज में दर्द था। मैं चुप रही, आँखें भर आईं। वो करीब आया, हाथ मेरे कंधे पर रखा। बोला, “भाभी… रो मत। मैं हूँ ना।” उसका हाथ गरम था। मैं सिहर गई। बोली, “राहुल… तू छोटा है… समझता नहीं।” वो बोला, “भाभी… मैं छोटा नहीं हूँ अब। सब समझता हूँ। आपकी उदासी देखता हूँ, रात को आपकी सिसकारियाँ सुनता हूँ कभी।” मैं शर्मा गई, चौंकी। वो जानता था? वो और करीब आया, हाथ मेरी कमर पर सरका। बोला, “भाभी… मैं कितने टाइम से तुझे चाहता हूँ। तेरी बॉडी, तेरी आँखें… सह नहीं पाता।” मैं रोने लगी धीरे से। बोली, “राहुल… मैं विधवा हूँ… २२ की विधवा… मेरी जिंदगी खत्म हो गई। कोई नहीं चाहेगा मुझे।” वो मुझे गले लगाया। उसकी छाती मजबूत, दिल की धड़कन तेज। मैं लिपट गई, रोते हुए।
फिर वो मेरा चेहरा ऊपर किया, आँसू पोंछे। बोला, “भाभी… मैं चाहता हूँ तुझे। पूरी तरह।” और होंठों पर किस किया। पहले हल्के से, जैसे डर रहा हो। मैं रुकी, लेकिन फिर जवाब दिया। साल भर की प्यास, अकेलापन सब बाहर आ गया। किस गहरा हो गया। उसकी जीभ मेरी जीभ से लिपटी। मेरे हाथ उसके बालों में। उसके हाथ मेरे पल्लू पर, सरका दिया। ब्लाउज के ऊपर चूचियाँ दबाने लगा। बोला, “भाभी… कितनी बड़ी हैं तेरी चूचियाँ… मुलायम…” मैं सिसकारी, “राहुल… धीरे… दर्द हो रहा है…” लेकिन मजा आ रहा था। वो ब्लाउज के बटन खोले, ब्रा उतारी। चूचियाँ बाहर। राहुल ने देखा, आँखें चमक गईं। बोला, “भाभी… कितनी सुंदर हैं… गुलाबी निप्पल्स…” मुँह में लिया एक, चूसा जोर से। जीभ से घुमाया। मैं तड़प रही थी, कमर उठा रही थी, “आह राहुल… चूस… तेरी विधवा भाभी की चूचियाँ चूस… कितने टाइम बाद किसी ने छुआ…”
उसका हाथ नीचे सरका। साड़ी ऊपर की, पेटीकोट। पैंटी पर हाथ। गीली थी पूरी। बोला, “भाभी… कितनी तर हो गई है तेरी चूत… मेरे लिए गीली हुई?” मैं शर्मा गई, लेकिन बोली, “हाँ राहुल… तेरी वजह से…” वो पैंटी उतारा। मेरी चूत पर उँगलियाँ घुमाने लगा। क्लिट दबाई। मैं कराही, “राहुल… अंदर डाल…” वो दो उँगलियाँ अंदर डालीं। चूत टाइट थी महीनों बाद। मैं चीखी थोड़ी, लेकिन बोली, “और… तेज…” वो उँगलियाँ चलाने लगा, जीभ चूचियों पर। मैं झड़ गई पहली बार, रस उसके हाथ पर बह गया। पूरा बदन काँपा, साँसें तेज।
फिर मैंने उसका कुर्ता उतारा। छाती चौड़ी, हल्के बाल। किस किया वहाँ। नीचे पजामा। लंड बाहर आया – मोटा, लंबा, सख्त, मेरे पति से बड़ा। मैं डर गई थोड़ी, हाथ में लिया। गरम, नसें उभरी। सहलाया। राहुल कराहा, “भाभी… आह… तेरे हाथ… चूस ना…” मैंने मुँह में लिया। पहली बार किसी और का। गरम, नमकीन स्वाद। जीभ घुमाई। राहुल ने मेरे बाल पकड़े, “भाभी… चूस… देवर का लंड चूस… गले तक…” मैं कोशिश की। वो पागल हो रहा था। फिर वो नीचे आया। मेरी चूत पर मुँह रखा। जीभ से चाटने लगा। पहले बाहर, फिर अंदर। क्लिट चूसी जोर से। मैं चिल्ला रही थी, “राहुल… चाट… तेरी २२ साल की विधवा भाभी की चूत चाट… आह… मजा आ रहा है…” वो चाटता रहा, तीन उँगलियाँ अंदर। मैं फिर झड़ी, पैर उसके सिर पर कस गए।
फिर वो ऊपर आया। लंड चूत पर रगड़ा। बोला, “भाभी… डालूँ? तेरी चूत मारूँ?” मैंने पैर फैला दिए, बोली, “हाँ राहुल… चोद मुझे… अपनी विधवा भाभी को चोद… भर दे मुझे…” वो धीरे डाला। चूत टाइट, दर्द हुआ। मैं सिसकारी, “आह… राहुल… धीरे… कितना मोटा है…” वो रुका, किस किया। फिर पूरा डाला। मैं कराही, लेकिन कमर उठाई। वो धक्के मारने लगा। धीरे-धीरे, फिर तेज। मेरी चूचियाँ उछल रही थीं, वो दबाता, चूसता। मैं बोली, “जोर से राहुल… चोद… फाड़ दे मेरी चूत…” वो पागल हो गया। तेज-तेज धक्के। बेड हिल रहा था। मैं नाखून उसकी पीठ में गड़ा रही थी। वो मुझे पलटा, कुत्ते स्टाइल में। गांड ऊपर। थप्पड़ मारे। बोला, “भाभी… तेरी गांड कितनी मोटी है… मारूँ?” लंड डाला पीछे से। और गहरा गया। मैं चिल्ला रही थी, “हाँ राहुल… मार… पूरी रात चोद अपनी विधवा भाभी को…” वो बाल पकड़कर खींच रहा था, धक्के मार रहा था। आखिर में बोला, “भाभी… अंदर झड़ूँ?” मैंने कहा, “हाँ… भर दे… बच्चा दे दे मुझे…” वो अंदर झड़ा। गर्म वीर्य मेरी चूत में फैला। मैं भी काँपकर झड़ी, तीसरी बार।
हम लिपटकर लेटे रहे। राहुल बोला, “भाभी… मजा आया? मैं कितने टाइम से सपना देखता था।” मैं रो रही थी खुशी से, बोली, “राहुल… बहुत मजा आया। कितने टाइम बाद ऐसा सुकून मिला।” हम हँसे। पूरी रात सोए नहीं। दूसरी बार मैं ऊपर आई। लंड पर बैठी, धीरे नीचे गई। कमर हिलाने लगी। राहुल नीचे से धक्के मारता, चूचियाँ दबाता। मैं उछल रही थी, “राहुल… तेरी विधवा भाभी तेरे लंड पर राइड कर रही है…” वो बोला, “भाभी… राइड कर… तेरी चूत कमाल की है…” मैं झड़ी दो बार। तीसरी बार 69 में। मैं उसका लंड चूसती, वो मेरी चूत। रस और वीर्य का स्वाद मिला। चौथी बार दीवार से टिकाकर खड़े-खड़े। मैंने पैर उसकी कमर में लपेटे। वो जोर-जोर से चोद रहा था। मेरी गांड पर थप्पड़। पाँचवीं बार सुबह। राहुल ने गांड ट्राई की। पहले उँगली, ऑयल लगाया (किचन से लाया था)। दर्द बहुत हुआ, मैं रोई, लेकिन बोली रुक मत। आधा गया तो मजा आने लगा। वो धीरे चोदा गांड। मैं खुद पीछे धकेलने लगी। झड़ी फिर।
सुबह सब नॉर्मल हो गए। सास-ससुर आए तो हम दूर-दूर। लेकिन नजरें मिलतीं तो समझ जाते। अब जब वो बाहर जाते, राहुल मेरे कमरे में आता। दिन में भी कभी, घर खाली हो तो। २२ साल की विधवा… लेकिन अब जिंदा महसूस करती हूँ। गिल्ट होता है कभी – समाज क्या कहेगा, सास-ससुर को पता चला तो? लेकिन राहुल कहता, “भाभी… तू मेरी है अब। मैं तुझे खुश रखूँगा।” मैं मान जाती। वो मुझे प्यार करता है, छूता है, चोदता है। मेरी चूत अब उसकी आदत हो गई। ये राज़ हमारा है, शायद हमेशा रहे। आज ये सब लिखकर लगा जैसे बोझ उतर गया। शायद कभी किसी को बताऊँ, लेकिन अभी नहीं।