हेलो दोस्तों कैसे हैं आपलोग, मेरी सेक्स कहानी डॉट कॉम पर मुझे सेक्स कहानियां पढ़ना बहुत अच्छा लगता है इसलिए आज मैं पहली बार अपनी एक कहानी पोस्ट कर रहा हूँ। ये कहानी मेरे भैया के साली के बारे में जो मेरी साली भी हुई . वो मुझे ऐसे भी जीजू ही कहती है। तो अब मैं बिना देर किये अपनी कहानी आप सभी दोस्तों को बता रहा हूँ। मुझे उम्मीद है आपको मेरी ये कहानी हॉट और सेक्सी जरूर लगेगी। भाभी की छोटी बहन की चुदाई (एक अनोखी देसी हिंदी सेक्स कहानी – पूरी तरह नई, असली जज्बातों वाली, गर्मागर्म और रियल लाइफ जैसी)
मेरा नाम अर्जुन है। मैं ३४ साल का हूँ, कानपुर में एक छोटी सी इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकान चलाता हूँ। जिंदगी ठीक-ठाक चल रही थी – सुबह दुकान, शाम घर, बीच में थोड़ी-बहुत दोस्तों के साथ गप्पें। मेरा बड़ा भाई संजय दिल्ली में नौकरी करता है, उसकी बीवी यानी मेरी भाभी, शालिनी, बहुत ही घरेलू टाइप की औरत है। शालिनी भाभी की उम्र ३० के आसपास, गोरी, भरी हुई बॉडी, लेकिन वो घर संभालने में इतनी व्यस्त रहती है कि कभी उस तरफ ध्यान ही नहीं गया। लेकिन उसकी छोटी बहन, निवेदिता… निवेदिता को मैं प्यार से निवी कहता हूँ, वो तो जैसे मेरी जिंदगी में तूफान लेकर आई।
निवेदिता की उम्र २२ साल। वो दिल्ली यूनिवर्सिटी में एमए कर रही है। लंबी कद-काठी, काली-काली आँखें जो जैसे किसी को घूरकर पढ़ लेती हैं, बाल लंबे और घने, कमर इतनी पतली कि हाथ में समा जाए, लेकिन कूल्हे चौड़े और उभरे हुए। उसके स्तन… उफ्फ, वो तो जैसे किसी स्कल्प्चर की तरह परफेक्ट – मीडियम साइज, लेकिन इतने सख्त कि जब वो टाइट टॉप पहनती है तो निप्पल्स की शेप साफ नजर आती है। मैंने उसे पहली बार देखा था जब वो शालिनी भाभी के साथ हमारे घर आई थी – भाई की शादी की सालगिरह पर। निवेदिता गाँव से थी, लेकिन पढ़ाई के लिए दिल्ली में किराए के फ्लैट में रहती थी। उसकी मुस्कान में एक मासूमियत थी, लेकिन आँखों में शरारत जो मुझे शुरुआत से ही खींचती रही।
उस दिन शाम को पार्टी थी। घर में रिश्तेदार आए हुए थे। निवेदिता ने एक नीली साड़ी पहनी थी – पहली बार साड़ी में देखा उसे। साड़ी इतनी पतली कि उसकी कमर की लकीरें साफ दिख रही थीं। मैं किचन में पानी लेने गया तो वो वहाँ खड़ी थी, प्लेट साफ कर रही थी। मैंने कहा, “निवी, तू यहाँ क्या कर रही? जाकर बैठ ना।” वो मुड़ी, मुस्कुराई और बोली, “अरे जीजू, मैं मदद कर रही हूँ। आप तो बस ऑर्डर देते रहो।” उसकी आवाज में एक चुलबुलापन था। मैं पास गया, उसके कंधे पर हाथ रखा – बस दोस्ताना तरीके से। लेकिन उसने पीछे मुड़कर देखा, आँखों में कुछ था। “जीजू, आपकी दुकान कैसी चल रही? कभी दिल्ली आओ ना, मैं घुमाऊँगी।” मैंने हँसकर कहा, “क्यों नहीं, अगली बार आया तो तुझे बुलाऊँगा।”
पार्टी खत्म हुई। रात को सब सो गए। भाई-भाभी अपने कमरे में, मैं अपने में। लेकिन नींद नहीं आ रही थी। निवेदिता की वो मुस्कान याद आ रही थी। तभी दरवाजा खुला। मैं चौंका – निवेदिता अंदर आई, चुपके से। वो बोली, “जीजू, नींद नहीं आ रही। आपका कमरा बड़ा है, क्या मैं यहाँ सो जाऊँ?” मैंने कहा, “अरे, कोई प्रॉब्लम नहीं। लेकिन भाभी क्या कहेंगी?” वो हँसी, “वो सो रही हैं। मैं चुपके से सुबह चली जाऊँगी।”
वो मेरे बिस्तर पर आकर लेट गई – मेरे बगल में। रात की ठंडी हवा चल रही थी, लेकिन कमरे में गर्मी महसूस हो रही थी। मैंने करवट ली, उसकी तरफ। उसकी साड़ी थोड़ी सरक गई थी, पेट नंगा था। मैंने धीरे से हाथ रखा – उसकी कमर पर। वो थर्राई नहीं, बल्कि करीब सरक आई। “जीजू… ठंड लग रही है।” मैंने कहा, “कंबल ले लो।” लेकिन मेरा हाथ नहीं हटा। धीरे-धीरे ऊपर सरका – उसके स्तनों की तरफ। साड़ी का पल्लू गिर गया। ब्लाउज में से उसके स्तन उभरे हुए। मैंने दबाया। वो सिसकारी, “आह… जीजू… ये क्या…” लेकिन रोक नहीं।
मैंने उसे अपनी तरफ खींचा। होंठ उसके होंठों पर। वो पहले शर्मा गई, लेकिन फिर किस करने लगी – जैसे भूखी हो। उसकी जीभ मेरी जीभ से खेल रही थी। मैंने ब्लाउज के हुक खोले। ब्रा गुलाबी थी, पतली। मैंने ब्रा ऊपर की। उसके निप्पल्स गुलाबी, तने हुए। मैंने एक को मुँह में लिया, चूसा। वो कराह रही थी, “उफ्फ… जीजू… कितना अच्छा… कभी किसी ने ऐसा नहीं किया…” मैंने कहा, “तू कुंवारी है क्या?” वो शर्मा गई, “हाँ जीजू… लेकिन आपसे ही तोड़ना चाहती हूँ अपनी सील।”
मेरा लंड तन गया। मैंने उसकी साड़ी पूरी उतार दी। पेटीकोट नीचे किया। पैंटी सफेद, गीली। मैंने हाथ डाला – उसकी चूत गर्म, गीली। उंगली अंदर की। वो चीखी, “आह… दर्द… लेकिन मत रुको…” मैंने दो उँगलियाँ डालीं, घुमाईं। वो कमर उठा-उठाकर मजा ले रही थी। फिर मैंने जीभ लगाई – चूत चाटने लगा। उसका स्वाद… मीठा, नमकीन। वो पागल हो गई, “जीजू… मैं झड़ रही हूँ… आआह…” और वो झड़ गई, पूरा बदन काँप गया।
अब मेरी बारी। मैंने अपना पजामा नीचे किया। लंड ७.५ इंच का, मोटा, नसों वाला। वो देखकर डर गई, “जीजू… ये तो बहुत बड़ा… फट जाएगी मेरी…” मैंने कहा, “धीरे-धीरे करूँगा।” मैंने लंड चूत पर रगड़ा। फिर धीरे से सुपारा अंदर। वो रोने लगी, “आह… माँ… दर्द…” खून निकला। मैं रुका, उसे चूमा। फिर धीरे-धीरे पूरा अंदर। उसकी चूत इतनी टाइट कि लंड कस गया। मैंने धक्के शुरू किए – धीमे, फिर तेज। वो बोली, “अब मजा आ रहा… जोर से जीजू… चोदो अपनी निवी को…” मैं तेज हुआ। उसके स्तन मेरे हाथ में, मैं दबाता रहा। १५ मिनट तक चुदाई। आखिर मैं झड़ा – गर्म वीर्य उसकी चूत में। वो भी फिर झड़ी। हम दोनों पसीने से तर, एक-दूसरे से लिपटे रहे।
सुबह वो चुपके से चली गई। भाभी को कुछ पता नहीं। लेकिन वो दिन से हमारा सिलसिला शुरू हो गया। अगले दिन भाई-भाभी बाहर गए थे शॉपिंग। घर में अकेले। निवेदिता ने मुझे फोन किया, “जीजू, आओ ना… मैं इंतजार कर रही।” मैं दुकान बंद करके घर पहुँचा। वो तैयार थी – सिर्फ ब्रा और पैंटी में। मैंने दरवाजा बंद किया और उसे दीवार से सटाकर चूमने लगा। उसके पूरे बदन पर किस। फिर मैंने ब्रा उतारी, स्तन चूसे। नीचे घुटनों पर बैठा, पैंटी नीचे की। उसकी चूत अभी भी सूजी हुई थी कल की चुदाई से। मैंने फिर चाटा। वो खड़ी-खड़ी झड़ गई।
फिर मैंने उसे बेड पर लिटाया। इस बार ६९ पोजिशन। मेरा लंड उसके मुँह में। वो पहले हिचकी, लेकिन फिर चूसने लगी – जैसे आइसक्रीम। मैं उसकी चूत चाट रहा था। वो बोली, “जीजू… आपका लंड कितना टेस्टी…” मैंने कहा, “चूसती रह…” फिर मैंने उसे ऊपर बिठाया। वो खुद उछलने लगी। उसके कूल्हे मेरी जाँघों पर थप-थप मार रहे थे। मैं उसके निप्पल्स पिंच कर रहा था। वो चीख रही थी, “आह… जीजू… गहरा… और गहरा…”
हमने दो राउंड किए। पहला मिशनरी, दूसरा डॉगी। डॉगी में पीछे से उसकी गांड देखकर मैं पागल हो गया। मैंने उंगली उसकी गांड में डाली। वो बोली, “जीजू… वो जगह… गंदी है…” लेकिन मैंने कहा, “नहीं, आज ट्राई करते हैं।” मैंने थूक लगाया, उंगली घुमाई। वो कराह रही थी। फिर मैंने लंड डाला – गांड में। पहले दर्द हुआ, वो रोई, “नहीं जीजू… निकालो…” लेकिन मैं धीरे-धीरे अंदर किया। आखिर पूरा गया। मैं चोदने लगा। वो बोली, “अब अच्छा लग रहा… जोर से…” मैंने जोर-जोर से धक्के मारे। आखिर झड़ गया – गांड में।
उसके बाद निवेदिता दिल्ली चली गई। लेकिन हम फोन पर बात करते। वो कहती, “जीजू, आपकी याद आती है… रात में उंगली करती हूँ सोचकर।” मैं कहता, “अगली बार आ, और मजा करेंगे।”
दो महीने बाद वो फिर आई – छुट्टियों में। इस बार भाई बाहर टूर पर था। शालिनी भाभी घर पर थी, लेकिन वो शाम को मंदिर जाती थी। निवेदिता ने प्लान बनाया। शाम को भाभी गईं, हम किचन में। निवेदिता चूल्हे से सटकर खड़ी थी। मैं पीछे से गया, उसकी सलवार नीचे की। पैंटी साइड की। सीधे लंड डाल दिया। वो बोली, “जीजू… भाभी आ जाएँगी…” लेकिन मैं चोदता रहा। ५ मिनट में झड़ गया। वो मुस्कुराई, “रिस्की लेकिन मजेदार।”
रात को भाभी सो गई। निवेदिता चुपके से मेरे कमरे में। हमने पूरी रात चुदाई की। कभी बेड पर, कभी फर्श पर। वो कहती, “जीजू, मैं आपकी गुलाम हूँ… जो चाहो करो।” मैंने उसके मुँह में झड़ा। वो सब पी गई। सुबह तक हम थक गए।
एक दिन हम बाहर गए – पिकनिक पर। कानपुर के बाहर एक सुनसान जगह। कार में ही शुरू हो गया। वो मेरी गोद में बैठी, लंड अंदर। कार हिल रही थी। फिर बाहर जाकर घास पर। खुले में चुदाई। वो बोली, “जीजू… कोई देख लेगा…” लेकिन मजा दोगुना हो गया।
निवेदिता की पढ़ाई खत्म हो रही थी। वो कहती, “जीजू, शादी के बाद भी मिलते रहेंगे।” मैं कहता, “हाँ, तू मेरी है।” लेकिन दिल में डर था – अगर भाभी या भाई को पता चला तो? लेकिन वो प्यार नहीं, वो बस जज्बात थे – गर्म, भूखे जज्बात।
एक बार भाभी को शक हुआ। वो बोली, “विक्रम, तू और निवी बहुत क्लोज हो गए हो।” मैंने हँसकर टाल दिया। लेकिन निवेदिता ने कहा, “जीजू, सावधान रहना।”
अब निवेदिता दिल्ली में जॉब कर रही है। लेकिन हर महीने आती है। हम होटल में मिलते। कभी-कभी घर में रिस्क लेकर। उसकी चूत अब मेरे लंड की आदी हो गई। वो कहती, “जीजू, आपका वीर्य ही मेरी दवा है।” मैं कहता, “निवी, तेरी गांड मेरी फेवरेट है।”
ये कहानी है हमारी – भाभी की छोटी बहन और जीजू की। जिसमें प्यार कम, लेकिन सेक्स की भूख ज्यादा। रिस्क, मजा, जज्बात – सब मिलाकर। और ये सिलसिला चलता रहेगा, जब तक हमारी साँसें चलेंगी।