मेरा नाम प्रियंका है। अब मैं ३१ की हूँ, शादी को आठ साल हो गए, एक बेटी है छह साल की। घर संभालती हूँ, पति बैंक में मैनेजर हैं, अच्छी सैलरी, लेकिन टूर पर ज्यादा रहते हैं। लेकिन वो रात… देवर के साथ रंगरेलियाँ पूरी रात चुदाई… आज भी याद करती हूँ तो बदन में आग लग जाती है, चूत अपने आप गीली हो जाती है। विक्रम मेरा देवर है, २७ का, दुबला लेकिन बॉडी फिट, जिम जाता है, शहर में ही सॉफ्टवेयर कंपनी में जॉब करता है। घर में हम सब साथ रहते हैं – सास-ससुर, मैं, पति, बेटी, और विक्रम। विक्रम मुझे बहुत इज्जत देता, भाभी कहकर, मदद करता घर में। लेकिन पिछले दो साल से कुछ अजीब था। उसकी नजरें मेरी साड़ी के पल्लू पर, ब्लाउज की क्लीवेज पर, या जब मैं झुकती तो गांड पर रुक जातीं। मैं फील करती, शर्मा जाती, लेकिन मन में एक सिहरन होती। पति महीने में दस दिन ही घर, रातें अकेली कटतीं। मैं उँगली करती कभी, विक्रम की सोचकर। गिल्ट होता – देवर है यार, लेकिन वो हवस… बढ़ती जा रही थी।
वो रात थी पिछले होली की। घर में सबने होली खेली, रंग लगाए, नाचे-гाने। शाम को सब थककर सो गए। पति बाहर गए थे किसी ऑफिशियल टूर पर। सास-ससुर अपने कमरे में, बेटी सो गई। घर में सिर्फ मैं और विक्रम जाग रहे थे। हम हॉल में बैठे थे, टीवी पर कुछ पुरानी फिल्म चल रही थी। विक्रम ने बीयर निकाली, बोला, “भाभी… होली है, थोड़ा मजा कर लें?” मैंने हँसकर हाँ कह दी। हम पीने लगे। होली का रंग अभी भी बदन पर था, मेरी साड़ी पर, उसके कुर्ते पर। बातें होने लगीं – होली की, बचपन की। विक्रम बोला, “भाभी… आप कितनी हॉट लग रही हो रंग में।” मैं शर्मा गई, बोली, “विक्रम… शरम नहीं आती? भाभी हूँ तेरी।” लेकिन मन में खुशी हुई। वो करीब सरका, बोला, “भाभी… कितने टाइम से तुझे देखता हूँ। भैया लकी हैं।” उसकी आँखों में आग थी। मैं चुप रही। उसका हाथ मेरी जाँघ पर आया। साड़ी पर। मैं सिहर गई, लेकिन हटी नहीं।
फिर वो करीब आया, कान में फुसफुसाया, “भाभी… आज रंगरेलियाँ खेलें?” मैं समझ गई। दिल धड़क रहा था। मैंने कहा, “विक्रम… ये गलत है…” लेकिन आवाज में वो दम नहीं था। वो मुझे किस किया। होंठों पर। पहले हल्के, फिर जोर से। मैंने जवाब दिया। सालों की प्यास बाहर आ गई। उसके हाथ मेरे पल्लू पर, सरका दिया। ब्लाउज के ऊपर चूचियाँ दबाने लगा। मैं सिसकारी, “विक्रम… धीरे… कोई जग गया तो…” लेकिन मन चाह रहा था और। वो मुझे गोद में उठाया, अपने कमरे में ले गया। दरवाजा बंद किया। लाइट ऑफ, सिर्फ बाहर होली की लाइट्स से हल्की रोशनी।
वो मुझे बेड पर लिटाया। साड़ी उतारने लगा धीरे-धीरे। ब्लाउज के हुक खोले। ब्रा लाल, होली स्पेशल। ब्रा उतारी। चूचियाँ बाहर। विक्रम ने देखा, बोला, “भाभी… कितनी बड़ी और मुलायम हैं तेरी चूचियाँ…” मुँह में लिया, चूसा जोर से। निप्पल्स काटा। मैं तड़प रही थी, “आह विक्रम… चूस… तेरी भाभी की चूचियाँ चूस…” उसका हाथ नीचे, पेटीकोट में। पैंटी गीली। उँगलियाँ चूत पर। बोला, “भाभी… कितनी तर हो गई है तेरी चूत… मेरे लिए?” दो उँगलियाँ अंदर डालीं। मैं कमर उठा रही थी, “विक्रम… और… तेज…” वो उँगलियाँ चलाने लगा। मैं झड़ गई, रस उसके हाथ पर।
फिर मैंने उसका कुर्ता उतारा। छाती पर रंग लगा था, किस किया। नीचे पैंट। लंड बाहर – मोटा, लंबा, सख्त। मैंने हाथ में लिया, सहलाया। बोला, “भाभी… चूस ना…” मैंने मुँह में लिया। गरम, नमकीन। जीभ घुमाई। विक्रम कराह रहा था, “भाभी… आह… तेरी जीभ… चूस देवर का लंड…” वो मेरे बाल पकड़कर दबा रहा था। फिर वो नीचे आया। पेटीकोट और पैंटी उतारी। मेरी चूत पर मुँह रखा। जीभ से चाटने लगा। क्लिट चूसी। मैं चिल्ला रही थी, “विक्रम… चाट… तेरी भाभी की चूत चाट… आह…” वो चाटता रहा, उँगलियाँ अंदर। मैं फिर झड़ी।
फिर वो ऊपर आया। लंड चूत पर रगड़ा। बोला, “भाभी… डालूँ?” मैंने पैर फैला दिए, बोली, “हाँ विक्रम… चोद मुझे… तेरी भाभी को चोद…” वो धीरे डाला। चूत गरम थी, गीली। पूरा अंदर। मैं सिसकारी, “आह… विक्रम… कितना मोटा है तेरा लंड…” वो धक्के मारने लगा। धीरे-धीरे, फिर तेज। मेरी चूचियाँ उछल रही थीं, वो दबाता। मैं बोली, “जोर से देवर जी… चोद… रंगरेलियाँ मना…” वो पागल हो गया। तेज-तेज। बेड चरमरा रहा था। मैं नाखून उसकी पीठ में। वो मुझे पलटा, पीछे से। गांड ऊपर। थप्पड़ मारे। लंड डाला। और गहरा। बोला, “भाभी… तेरी गांड कितनी सेक्सी है…” मैं चिल्ला रही थी, “मार विक्रम… फाड़ दे… पूरी रात चोद मुझे…” वो बाल पकड़कर खींच रहा था। आखिर में अंदर झड़ा। गर्म वीर्य मेरी चूत में। मैं भी झड़ी।
हम लिपटकर लेटे। विक्रम बोला, “भाभी… मजा आया?” मैं हँसी, बोली, “बहुत… लेकिन रुक मत। पूरी रात है।” हम फिर शुरू हो गए। दूसरी बार मैं ऊपर आई। लंड पर बैठी, कमर हिलाई। विक्रम मेरी चूचियाँ दबा रहा था। मैं उछल रही थी, “विक्रम… तेरी भाभी तेरे लंड पर राइड कर रही है…” वो नीचे से धक्के मार रहा था। मैं झड़ी दो बार। तीसरी बार 69 में। मैं उसका लंड चूसती, वो मेरी चूत। रंग का स्वाद, पसीना, सब मिला। चौथी बार दीवार से टिकाकर। मैं खड़ी, वो पीछे से। मेरी गांड पर थप्पड़, लंड चूत में। मैं सहारा लेकर चिल्ला रही थी। पाँचवीं बार सुबह। वो मेरी गांड में ट्राई किया। पहले उँगली, ऑयल लगाया। दर्द हुआ, लेकिन मैंने कहा कर। आधा गया तो मजा आने लगा। वो धीरे चोदा गांड। मैं झड़ी फिर।
पूरी रात चुदाई। नींद नहीं आई। सुबह सब उठे तो हम नॉर्मल। लेकिन नजरें मिलतीं तो समझ जाते। अब जब पति बाहर, विक्रम रात को मेरे कमरे में। देवर के साथ रंगरेलियाँ पूरी रात चुदाई… अब आदत सी हो गई। गिल्ट है कभी, लेकिन वो मजा… वो प्यास बुझती है। विक्रम कहता, “भाभी… तू मेरी रानी है।” मैं मान जाती। ये राज़ हमारा है। आज लिखकर लगा हल्का हो गई। शायद कभी और लिखूँ।